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जज़्बात निगारी....

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विदाई अभी शेष है...

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  विदाई अभी शेष है... मेघ खाड़ी से सीधा उड़कर यही अड़ गया  मानो पूरब छोड़ उत्तर को बस गया।  कई दिनों से ठिठक कर रुका हुआ था मेरे गांव, खेत, खलिहान, और मुंडेरों पर। जैसे कोई बच्चा मेले में ठिठक जाता है मिठाई, खिलौनों, गुब्बारों की दुकान पर। ललचाई आंखों से निर्निमेष देखता लार से भीगे जिह्वा को संयत करता। वैसे ही आसमान से झांकते मेघ बेचारे  खुला हरा भरा मैदान देख;  अपने साथियों संग क्रीड़ा को आतुर। लालच वश कहीं भी न देखना  अथाह भरा पूरा हिमालय तो भूल ही गया। महीने का एक पक्ष पूरा बरसता रहा  रूक-रूककर, थम-थमकर। इस बार मेघ ने सभी को तृप्त किया समय से पूर्व, रिक्त से अधिक। मेघों को आता देख मंडूक भी  अपने समुदाय संग गायन को सज्ज हैं। शिखी भी अपने सतरंगी पंख फैलाए, इतराए। वैसे ही किसान भी रोहिणी नक्षत्र देख  धान हेतु खेतों को नहलाते-सहलाते  दुरुस्त करते  अपने हल, बैल, बीजों को। इस बरसात के मध्य कहीं दोपहरी में  एक-आध घंटे के लिए दिवाकर के दर्शन होते। जो कि पर्याप्त होता सूखने सूखाने हेतु  इस बरसात से ऊब तो नहीं हुई  पर मन भरा...

केश

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  हे मधुसूदन! पतित पावन यह निर्मल काया। गोविंद फिर ऐसा अनर्थ क्यूं; यह कैसी माया।। बिखरा दिए केश द्रौपदी ने दुःशासन अब तू बच ना पाएगा किया है स्पर्श अग्नि को तूने रणभूमि में इसका मूल्य चुकाएगा। मैं ज्वाला हूँ अग्नि की इसकी तेज तू सह ना पाएगा जलकर भस्म पतिंगा जैसे तू भी भस्म भस्म हो जाएगा। इन मलिन हाथों को धो डाल तू वरना काल का ग्रास बन जाएगा ना काम आएंगे शत बन्धु तेरे अकेले अपनी चिता सजाएगा। रक्त उतर आया इन नैनों में अब तू भी रक्त के अश्रु बहाएगा जब सामना होगा तेरा पाण्डवों से तू स्वयं तिल-तिल कर मर जाएगा। ना कोई होगा साथ तेरे जब अपने कुकर्मों का फल पाएगा तू हंसी का पात्र बनेगा तू अपयश का भागी बन जाएगा। जिस कुल में तूने जन्म लिया उसको भी तार तार कर जाएगा करके खण्डित मर्यादा अपनी पाप का भागी तू बन जाएगा। -©® Khushi Kandu 'Leelanath'

【विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस 28 जुलाई】

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 ( विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस  २८ जुलाई) मात्र पेड़ नहीं  प्रकृति भी बचानी होगी, हर जीव जन्तु को हर पशु पक्षी को बारिश की बूंदों को बचे कुचे तालाबों को कीट पंतगों को इतना ही नहीं! जो संघर्ष कर रहे हैं  उनका संघर्ष मिटाना होगा। जो विलुप्त हो चुके हैं  उन्हें वापस लाना होगा। आने वाले कल को जीवित रहने योग्य बनाना होगा। जिसके लिए मात्र पेड़ नहीं  प्रकृति भी बचानी होगी .... -©® Khushi Kandu 'Leelanath'

【चौपाई-२】

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   (चौपाई- २) काल चक्र मति ऐसा फेरा। गिरा गर्त छाया अंधेरा।। दया करो हे नाथ हमारे। सकल भूवन जिनके सहारे।। भावार्थ:-  समय ने मेरी बुद्धि को इस प्रकार फेर दिया (भ्रमित कर दिया) कि मुझे उचित अनुचित सब भूल गया फलस्वरूप गर्त (नर्क) में गिर पड़ा हूँ जहां अंधकार ही अंधकार है। जिनके सहारे सारा संसार है और जो सबके स्वामी हैं हम पर दया करें। काल चक्र मति ऐसा फेरा। गिरा गर्त छाया अंधेरा।। २ १  २१   ११  २२   २२,  १२  २१  २ २   २ २२ दया करो हे नाथ हमारे। सकल भूवन जिनके सहारे।। १२  १ २ २  २२  १२२,  १११    २२   ११२   १२२

【चौपाई】

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चौपाई-१ तन पे परै जो काट हमहूँ। विचलित ना हो प्रभु मन कबहूँ।। दे आशीष हमें कुछ ऐसा। धीरज धरै दूर हो क्लेशा।। भावार्थ:- हे प्रभु! इस तन पर जो भी बीते, उसको सहजता से काटूं, और हमारा मन कभी इससे विचलित ना हो। हे प्रभु! हमें कुछ ऐसा ही आशिर्वाद दीजिए कि हर परिस्थिति में हम अपना धैर्य बनाए रखें और शीघ्र ही सारे दुःख क्लेश दूर हों जाए। तन/ पे/ परै/ जो/ काट/ हमहूँ। विचलित/ ना/ हो/ प्रभु/ मन २/  २/ १२/  २/ २१/  २२,     २ २/    २/   २/ ११/    २/ कबहूँ। २ २ दे/ आशीष/ हमें/ कछु/ ऐसा। धीरज/ धरै/ दूर/ हो/ क्लेशा।।  २/ २२१/ १२/ २/ २ २,  २ २/  १२/  २१/  २/     २२

【दोहा संग्रह】

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  ।।दोहा।। हे प्रथम पूज्य विघ्नेश, बाधा हरते आप। आपके शुभागमन से, पूर्ण होते काज।।१।। ।।। हरी दर्शन की लालसा, भोर संध्या रैन। आओगे कब हे हरी, भीगत मोरे नैन।।२।। ।।। कैसी यह लड़ाई मनु, कैसा है अभिमान। चार दिन की है यात्रा, अंत में है श्मशान।।३।। ।।। छड दे प्यारे पाप कर्म, जप ले उसका नाम। चल उस डगर पे पगले, जो जाता प्रभु धाम।।४।। ।।। विचरत हैं सभी बाहर, जैसे कोई सांड। झांके न केहू अंदर, जहां सोई ब्रह्मांड।।५।। ।।। प्रेम पथ पर बाधा अति, है जानत संसार। जो किया सो उबर गया, बिनु पढ़े वेद सार।।६।। ।।। अरे मूर्ख मानव दैत्य , आचरण ले सुधार। पीटेगा तू एक दिन, जन करेगा प्रहार।।७।। ।।। अंतर्मन के सागर में, खोजत जैसे 'नीर'। 'मैं' की भावना तज कर, समझे जैसे पीर।।८।। ।।। लिखूं दोहा-चौपाई, अरू कुण्डलिया-छंद। बस यही भाए हमको, इ कबहु ना हो बंद।।९।। ।।। वस्त्र सुवर्ण से मन मोहे, जिसकी आयु है कम। यदि सद्गुण से हिय छुए, तो चक्षु ना हो नम।।१०।। ।।। संकट मोचन रामभक्त, बाला तेरो नाम। हे हनुमंत दया करो, आपको नित प्रनाम।।११।। ।।। सघन अंधेरा छाया, आओ मेरे श्याम। भीति लागै अति मोहे, पूरन ना हो काम।।१...

चौराहे की चाय....

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      मैं हर रोज सुबह सैर करने निकलती तो चौराहे की तरफ़ ज़रूर देखती थी। हलांकि मैं रुकती नही थी, पर वहां खड़े हुए कुछ महान विभूतियों के दर्शन जरूर करती थी; और ध्यान लगा के सुनती थी, कि आज कौन से मुद्दे पर चर्चा चल रही है।  ये हमारे मुहल्ले के कुछ ऐसे लोग थे जिनकी गाथा अनंत थी। सुबह की ये चाय-चर्चा तो देखते बनती थी। और तो और इन महान आत्मओं की सुबह का शौच भले ही छूट जाए पर इनकी चाय और चर्चा ना छूटने पाए। भले ही ये लोग उन बातों और आदर्शों को व्यवहार मे लाये या ना लाये लेकिन उन आदर्शों का नाम गिनाए बिना इनकी चाय-चर्चा मानो अधूरी थी।  "भई सवाल था कि, चर्चा में कोई एक दूसरे से पीछे ना रह जाए।"  कोई भी एक दूसरे से कम नही था।  कभी देश की बदहाली पर चर्चा चलती तो कभी राजनीतिक दल के किस्से होते थे। लेकिन हर रोज की तरह उस दिन चाय चर्चा कुछ ज्यादा खास थी। भई! उस दिन ना चाय थी और ना ही चाय वाला। किसी कारणवश उस दिन चाय वाला अपनी दुकान लगाने में असर्मथ था। भगवान् जाने क्या मजबूरी आन पड़ी थी। वो बेचारा अकेला ठहरा घर -दुकान चलाने वाला, साथ में बीबी, दो बच्चे और बूढ़ी मां।...

संगीत और साहित्य....

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   [संगीत और साहित्य] संगीत वीणा की तान, साहित्य जग का मान  एक प्रेम का घोतक, दूसरा सत्य की खोज। संगीत सुरों की वाणी, साहित्य जग का दर्पण एक करे पुलकित मन, दूसरा दिखाए मार्ग। संगीत एक साधना, साहित्य शुध्द भावना एक सिखाए भक्ति, दूसरा ले जाए उस ओर। संगीत ही सरस्वती, साहित्य भी वेद-पुराण एक करो धारण, दूसरा स्वयं चलके आए पास। संगीत संवारे सृष्टि, साहित्य करे जग का उत्थान दोनों ही एक दूसरे के पूरक, दोनों ही आधार। जैसे अर्धनारीश्वर, एक पौरुष दूसरा प्रकृति दोनों का सम्मलित रूप बने, शिव और शक्ति। -©®Khushi Kandu Leelanath

हर मन कृष्णा गीत के गुण गाए....

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  का लिखुंगी कान्हा कोई बात नहीं तेरे जाने का तुझे हर्ष है, हमें  तो आघात सही। *** अब कैसी दिन है और कैसी रात,  किसे खबर है यह और किसको पता  यहां सारे बात। *** अब तो बस चारों ओर तेरी प्यास अब तो ना किसी को कोई सुध,अब यमुना भी उदास। *** गौ ना घास खाए वो भी निरंतर अश्रु  बहाए, विलाप कर रही लता-पताए नदियां-झरने भी झड़ी-सूखी जाए  *** व्याकुल हैं तेरे बिन, सारे वासी सबको है तेरी  वही याद सताए देख रहे तेरी  राह, हर मन कृष्णा गीत के गुण गाए। *** -©® Khushi Kandu Leelanath

इक आज़ाद नज़्म....

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  मुकम्मल इश्क़ ना मिले तो ख़ुदा से मिलना;  इस वास्ते दुनिया जुदा होके चलना। मिल जाएगा मुकम्मल इश्क़-ओ-ख़ुदा दोनों ही; बस अपनों से थोड़ा विदा लेके चलना।   जिस दुनिया में जी रहे हो, वो तुम्हारी दुनिया नहीं; असल में हक़ीक़त क्या है, उसका तुम्हें पता ही नहीं। जिस राह पर चल रहे हो, वो तुम्हारा रस्ता ही नहीं; तुम बेज़ार हो ज़िंदगी से, ये जीवन इतना सस्ता भी नहीं। जो तुम देख रहे हो इस जहां में, सबकुछ वैसा नहीं; कई असरार छिपे हैं, इसका रंग भी गिरगिट जैसा ही। यहां हर कोई नुमाइश के नुमाइंदे हैं; पैदाइश से कोई ख़ुदा के बन्दे नहीं। ज़मीर-ए-पाक बिना यहां पर जीना बेकार है; ज़ुबाँ-ए-इश्क़ यहां का सबसे बड़ा हथियार है। ज़िंदगी मिली है, तो ख़ुदा के लिए भी वक़्त निकाल; तुम भी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा हो, अब दुनिया के लिए बन मिसाल। (*मुकम्मल:- पूर्ण/सफल, *इश्क़-ओ-ख़ुदा:-प्रेम और भगवान, *बेज़ार :- उदास, *असरार:- रहस्य, *नुमाइश:- प्रर्दशन, *नुमाइंदे:- प्रतिनिधि, *ज़मीर-ए-पाक:- पवित्र आत्मा, *ज़ुबाँ-ए-इश्क़:- प्रेम की भाषा, *ख़ल्क़-ए-ख़ुदा:- ईश्वर की रचना।)     

मेरे पापा...

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  मेरे पापा सबसे अच्छे; ज़मी नहीं तारों के जैसे  एक दफ़ा नही सौ दफ़ा कहेंगे ऐसे! मेरे पापा सबसे अच्छे।।। फूलों को जैसे नीर सींचते वैसे ही पापा हमें सींचते एक दफ़ा नही सौ दफ़ा कहेंगे ऐसे! मेरे पापा सबसे अच्छे।।। ओस की बूंद से, जैसे घास सने वैसे ही पापा के प्यार से हम बढ़े एक दफ़ा नही सौ दफ़ा कहेंगे ऐसे! मेरे पापा सबसे अच्छे।।। जैसे बिना सूर्य के ना दिन निकलते वैसे ही बिना पापा के कहां संवरते एक दफ़ा नही सौ दफ़ा कहेंगे ऐसे! मेरे पापा सबसे अच्छे।।। जो हमारी मुस्कान लिए  सारे जख्म झेलते भला उनकी जज़्बात से कैसे खेलते मेरे पापा सबसे अच्छे  एक दफ़ा नही सौ दफ़ा कहेंगे ऐसे।     

मोहब्बत का वो दौर लाओ....

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  यारो कोई तो मोहब्बत का वो दौर लाओ वो ग़लिब की शायरी बेग़म का शोर लाओ। ..... सदियों से मेरा महबूब मिलने नहीं आया इल्तिजा है मेरी कोई उसे मेरी ओर लाओ।  ..... ग़ुमसुम है कहीं, कोई तो उसे याद दिलाओ बांध सके हम दोनों को ऐसा कोई डोर लाओ। ..... ऐ ख़ुदा! जल्द ख़त्म हो हम दोनों की मसाफ़त हम फिर से मिले वहीं, रास्ते का वो छोर लाओ।

【पूछ रहा है मेरा मन】

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   पूछ रहा है मेरा मन.....🖋️ यह कैसी सृष्टी रची जगदीश पूछ रहा है मेरा मन विषाद से भरे हैं हृदय, रोग ग्रसित है सबका तन। काम, क्रोध, लोभ, मोह कुंठाओं का अम्बार लगा दुःख कैसा है यह पीड़ा क्यूं है पूछ रहा है मेरा मन। चहुँ ओर अशांति है, दसों दिशाओं में असंतोष है हिंसा ही हिंसा का समाधान है पूछ रहा है मेरा मन। दीन हीन तिस्कारित यहां हर स्त्री पर अभिशाप है स्वतंत्रता क्यूं नहीं दी स्त्री को पूछ रहा है मेरा मन। अगणित प्रश्न मेरे मन में कौन इनका समाधान करे देखकर सृष्टी की ये दशा अधीर हो उठा है मेरा मन।

【बेज़ार】

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  हर शय बेरंग लगे, हर शख़्स बेज़ार दुनिया में कोई मीत नहीं ना ही यार। भूलूं किस हमदम को किसे करूँ याद  ना ही कोई इश्क़ मेरा ना कोई प्यार। मुस्कान नहीं लब पे आंखों में है आब ख़ुशियाँ बिकती तो खरीद लूं बाज़ार। विरान पड़े रस्ते पेड़ों पर नहीं शाख बन गए रहज़न सब आंखों में अंगार।                 - ©® K. K. Leelanath

【सो जाओ मोहन रैन आई...】

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सो जाओ मोहन रैन आई विश्राम करो नैन अलसाई। आंखें मूंदत भोर मा जागत उठत क्रीड़ा संध्या धावत। रात्रि आई फिर घर आवत भोजन कर माखन खावत। सो जाओ मोहन रैन आई विश्राम करो नैन अलसाई।। प्रातः उठ वही दोहरावत उठत खावत पुनः धावत वही लाड प्यार है पावत माता को भी यह भावत सो जाओ मोहन रैन आई विश्राम करो नैन अलसाई।।

◆ Depression (अवसाद), शिकार या सुधार। किस स्थिति में हैं आप? ◆

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(विश्व स्वास्थ्य दिवस ७ अप्रैल) "डिप्रेशन (अवसाद) एक प्रकार की मानसिक बिमारी व आशांति है।"   अवसाद का सम्बन्ध मस्तिष्क के उन हिस्सों से है, जहां से निद्रा, जागरण व चेतना की स्थिति नियंत्रित होती है।       क्या है कारण?   सामाजिक व पारिवारिक कारण:-  आज के दौर में डिप्रेशन (अवसाद) का शिकार होना बहुत सामान्य सी बात बन गई है। एक सामान्य व्यक्ति भी कब डिप्रेशन का शिकार हो जाता है पता ही नहीं चलता। आज व्यक्ति मानसिक दृष्टि से इतना कमजोर हो चुका है कि उसके जीवन में ज़रा सा उतार-चढाव क्या आता है, कि उस विषय में इतना सोचता है कि खुद को अवसाद ग्रस्त बना लेता है और यही अवसाद उसे अत्महत्या की ओर ले जाता है। वर्तमान में युवा वर्ग विशेष कर स्टूडेंट्स में यह अधिक देखने को मिलता है। बड़े होने के साथ-साथ पढ़ाई का दबाव और जिम्मेदारियों का बढ़ना उन्हें असहज और अप्रिय माहौल लगने लगता और जब वे उसमें जल्दी सामांंज्स्य नहीं बिठा पाते तब लगातार उस बारे में सोचने लगते हैं और यह उन्हें बड़ा ही असम्भव सा लगता जिसको लेकर वे बहुत चिंतित हो जाते हैं। जो आगे चलकर उनकी ...

कोरोना- एक प्राकृतिक आपदा के रूप में....

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(कोरोना) कोरोना एक महामारी है कुदरत की चिंगारी है। है रुष्ट अब धरा भी प्रकृति का ह्रास हुआ। है जनजीवन संकट में सत्य का नाश हुआ। जल, थल, नभचर का  घर मानव ने उजाड़ा है। उनका भी हक़ है धरती पर आख़िर उन्होंने क्या बिगाड़ा है? पृथ्वी की गोद में सबको समान अधिकार है। जो ना समझे इस मर्म को उसको धिक्कार है। प्रकृति का दोहन छोड़ के प्रति मानव पेड़ लगाओ। विकास गति थोड़ी धीमी कर इस संसार को स्वर्ग बनाओ। - ©ख़ुशी कान्दू

नाटक-: एक सवप्न प्लास्टिक मुक्त भारत का......

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पात्र परिचय 1- रामाधीन मुंशी 2- मुंशी की पत्नी 3- वकील 4- वकील की पत्नी 5- चेतू (सब्ज़ी वाला) 6- एक अन्य ग्राहक (प्रथम दृश्य / रामाधीन मुंशी जी के घर का दृश्य) (रामाधीन मुंशी जी प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर भगवान की आराधना में व्यस्त अपने इष्ट का गुणगान करते हुए...) हरे कृष्णा हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा  हरे हरे। हरे रामा हरे रामा, रामा रामा हरे हरे।। भजन समाप्त करते हुए प्रभु की चरनो में नतमस्तक होते हैं। पूजा-पाठ खत्म करने के बाद बाहर बरामदे में लगी कुर्सी पर आकर बैठ जाते हैं और वहां रखी अख़बार उठाकर पढ़ने लगते हैं। थोड़ी देर बाद उनके पड़ोसी मित्र जो पेशे से वकील हैं, टहलते हुए आते हैंं।  मुंशी जी-   आइए-आइए बैठिए, आज इधर कैसे आना हुआ? वकील - (बैठते हुए बोलते हैं) हां! काफी दिनों से आप दिखाई नहीं दिए और इधर से टहलते हुए जा रहा था तो सोचा आप से भी मिलता चलूं। मुंशी जी - हां आजकल जोड़ों का दर्द कुछ अधिक ही बढ़ गया है, सो नहीं जा पाता हूं सुबह टहलने... वकील - हां आपकी बात भी सही है, अब क्या किया जाए जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती है, वैसे वैसे तमाम बिमारियां...

【मंदिर-मस्जिद में फ़र्क दिखाए मुझे】

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बंटवारे से हम भी थोड़े प्रेरित हुए,  इसलिए हमारे शब्द भी इसी पर केन्द्रित हुए। कोई ज्ञानी हो तो बताए मुझे  मंदिर व मस्जिद में फ़र्क दिखाए मुझे। मैंने तो सुना था ईश्वर एक है किन्तु यहां आकर मैंने जाना! भगवान अनेक है।। उसका रंग अलग  एक ने चुना लाल रंग तो दूजे हरे रंग से शान बढ़ाते हैं। उसका रूप अलग एक के माथे पर मोर मुकुट तो दूजे को टोपी पहनाते हैं उसकी बनावट अलग  एक को निराकार तो दूजे को सकार ब्रह्म दिखाते हैं।। उसकी सजावट अलग एक को आभूषणों से तो दूजे को केवल चादर चढ़ाते हैं उसकी भाषा अलग एक को उर्दू तो दूजे को संस्कृत से दर्शाते हैं। उसकी परिभाषा अलग। हाय! परिभाषा में ना जाने लोग क्या-क्या बतलाते हैं।। बस इन्हीं आधारों पर कर दिया पृथक ईश्वर-अल्लाह को अब हर रोज़ मज़हब के नाम पर लड़वाते हैं। व्यथित हो रहा ये मन मेरा  आख़िर कब अंत होगा इस व्याग्रता का जिसको हम व्यर्थ में सहते जाते हैं।। काश! समझ पाता यह मानव प्रेम से बढ़कर कुछ नहीं क्यूं बेवजह हम एक-दूजे का रक्त बहाते हैं। ना कोई स्थाई सदस्य है इस दुनिया का ...