विदाई अभी शेष है...
विदाई अभी शेष है... मेघ खाड़ी से सीधा उड़कर यही अड़ गया मानो पूरब छोड़ उत्तर को बस गया। कई दिनों से ठिठक कर रुका हुआ था मेरे गांव, खेत, खलिहान, और मुंडेरों पर। जैसे कोई बच्चा मेले में ठिठक जाता है मिठाई, खिलौनों, गुब्बारों की दुकान पर। ललचाई आंखों से निर्निमेष देखता लार से भीगे जिह्वा को संयत करता। वैसे ही आसमान से झांकते मेघ बेचारे खुला हरा भरा मैदान देख; अपने साथियों संग क्रीड़ा को आतुर। लालच वश कहीं भी न देखना अथाह भरा पूरा हिमालय तो भूल ही गया। महीने का एक पक्ष पूरा बरसता रहा रूक-रूककर, थम-थमकर। इस बार मेघ ने सभी को तृप्त किया समय से पूर्व, रिक्त से अधिक। मेघों को आता देख मंडूक भी अपने समुदाय संग गायन को सज्ज हैं। शिखी भी अपने सतरंगी पंख फैलाए, इतराए। वैसे ही किसान भी रोहिणी नक्षत्र देख धान हेतु खेतों को नहलाते-सहलाते दुरुस्त करते अपने हल, बैल, बीजों को। इस बरसात के मध्य कहीं दोपहरी में एक-आध घंटे के लिए दिवाकर के दर्शन होते। जो कि पर्याप्त होता सूखने सूखाने हेतु इस बरसात से ऊब तो नहीं हुई पर मन भरा...