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सुरक्षा; गांव बनाम शहर

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  आज सुबह जब मैं स्टेशन के लिए जा रही थी तक़रीबन चार बज रहे होंगे। अंधेरा वैसा ही जैसा रात का, सूर्योदय होने में अभी समय था। वो अलग बात है कि आज हर गांव में बिजली की पहुंच है जिसकी लिए सरकार धन्यवाद की पात्र है।       लेकिन इन सभी के बीच जो मैंने देखा, वह है सुरक्षा के कोई चाक-चौबंद की व्यवस्था न होने पर भी आज भी लोग गर्मी का मौसम होने के कारण घरों के बाहर चारपाई डालकर सो रहे थे। भोर का समय था तो महिलाएं भी शौच आदि के लिए बाहर जा रही थी जो कि हर गांव की परंपरा है कि घर में शौचालय होते भी लोग शौच के लिए बाहर जाना अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते हैं। कुछ लोग घर के बाहर खड़े जम्हाई ले रहे थे, सम्भवतः तुरंत जगे होंगे। यह सब देखते हुए मेरे मन में एक विचार कौंध गया। सुरक्षा की तो बात ही छोड़ दीजिए जिस तरह लोग बेधड़क घरों के बाहर सो रहे हैं, महिलाऐं अंधेरे में भी विचरण कर रही हैं, सन्नाटा होते हुए भी हर दस क़दम पर लोग मिल जाएंगे।       न ही लोगों को चोर उचक्कों का डर न ही किसी जंगली जानवर का। लोगों में ऐसी निश्चिंतता देखकर मैं अचरच से भर उठी। पर मुद्दा यहीं...

जज़्बात निगारी....

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विदाई अभी शेष है...

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  विदाई अभी शेष है... मेघ खाड़ी से सीधा उड़कर यही अड़ गया  मानो पूरब छोड़ उत्तर को बस गया।  कई दिनों से ठिठक कर रुका हुआ था मेरे गांव, खेत, खलिहान, और मुंडेरों पर। जैसे कोई बच्चा मेले में ठिठक जाता है मिठाई, खिलौनों, गुब्बारों की दुकान पर। ललचाई आंखों से निर्निमेष देखता लार से भीगे जिह्वा को संयत करता। वैसे ही आसमान से झांकते मेघ बेचारे  खुला हरा भरा मैदान देख;  अपने साथियों संग क्रीड़ा को आतुर। लालच वश कहीं भी न देखना  अथाह भरा पूरा हिमालय तो भूल ही गया। महीने का एक पक्ष पूरा बरसता रहा  रूक-रूककर, थम-थमकर। इस बार मेघ ने सभी को तृप्त किया समय से पूर्व, रिक्त से अधिक। मेघों को आता देख मंडूक भी  अपने समुदाय संग गायन को सज्ज हैं। शिखी भी अपने सतरंगी पंख फैलाए, इतराए। वैसे ही किसान भी रोहिणी नक्षत्र देख  धान हेतु खेतों को नहलाते-सहलाते  दुरुस्त करते  अपने हल, बैल, बीजों को। इस बरसात के मध्य कहीं दोपहरी में  एक-आध घंटे के लिए दिवाकर के दर्शन होते। जो कि पर्याप्त होता सूखने सूखाने हेतु  इस बरसात से ऊब तो नहीं हुई  पर मन भरा...