सुरक्षा; गांव बनाम शहर
आज सुबह जब मैं स्टेशन के लिए जा रही थी तक़रीबन चार बज रहे होंगे। अंधेरा वैसा ही जैसा रात का, सूर्योदय होने में अभी समय था। वो अलग बात है कि आज हर गांव में बिजली की पहुंच है जिसकी लिए सरकार धन्यवाद की पात्र है। लेकिन इन सभी के बीच जो मैंने देखा, वह है सुरक्षा के कोई चाक-चौबंद की व्यवस्था न होने पर भी आज भी लोग गर्मी का मौसम होने के कारण घरों के बाहर चारपाई डालकर सो रहे थे। भोर का समय था तो महिलाएं भी शौच आदि के लिए बाहर जा रही थी जो कि हर गांव की परंपरा है कि घर में शौचालय होते भी लोग शौच के लिए बाहर जाना अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते हैं। कुछ लोग घर के बाहर खड़े जम्हाई ले रहे थे, सम्भवतः तुरंत जगे होंगे। यह सब देखते हुए मेरे मन में एक विचार कौंध गया। सुरक्षा की तो बात ही छोड़ दीजिए जिस तरह लोग बेधड़क घरों के बाहर सो रहे हैं, महिलाऐं अंधेरे में भी विचरण कर रही हैं, सन्नाटा होते हुए भी हर दस क़दम पर लोग मिल जाएंगे। न ही लोगों को चोर उचक्कों का डर न ही किसी जंगली जानवर का। लोगों में ऐसी निश्चिंतता देखकर मैं अचरच से भर उठी। पर मुद्दा यहीं...