उमड़ते जज़्बात....

 

उमड़ते जज़्बात...

उठते तरंगों में दे किनारा,

भटकते को कैसे गुज़ारा।

थोड़ा हवाओं को मंद कर, 

लौ हमारी बनेगी अंगारा।

।।।

मेरी आवाज़ तुम्हें पहुंचती 

भले तू कोई; न दे इशारा

ज़माने से भला क्या लेना?

रब बन बैठा अपना सहारा।

।।।

ग़लतियों ने हमको सिखाया सबक़ 

और ग़लतियां अब नहीं गवारा।

क़दम डगमगाते हैं उठने से पहले 

राहों पर हों लाखों बहारा।

।।।

दुनिया समझती गुस्ताख़ हैं 

करते रहो मिन्नतें हजा़राॅं।

अपने दिल की ख़ुदा ही जाने

उसकी रहनुमा में फिरता ये तारा।

        

                - के. के. 'लीलानाथ'

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