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【घर से दूर मैं मजबूर】

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         बात उन दिनों की है जब मैं लखनऊ में  शास्त्रीय संगीत की छात्रा थी। घर से दूर इक अज़नबी शहर में रहते हुए हर छोटे-बड़े  अनुभव को आत्मसात करने की कोशिश कर रही थी। ऐसे भीड़ -भाड़ वाले शहरो में हर रोज़ कुछ ना कुछ  घटनाएं अवश्य होती रहती हैं। इन सब घटनाओं को मद्देनजर रखते हुए, मैं खुद को उस परिवेश में ढालने की कोशिश कर रही थी। यह मेरा शुरूआती दौर तो नही था, "यथा- तथा लगभग दो वर्ष बीत चुके थे" फिर भी मैं यहां के अपरिचित लोगों से भयभीत रहती थी।  जैसा कि हर लड़की के साथ होता है। शुरुआत के दो वर्ष मैं अपने ही कॉलेज की शिक्षिका के साथ रही। जो की मेरी शिक्षिका कम गुरु माँ और बड़ी बहन ज्यादा थीं। हां वो थोड़ी क्रोधित स्वाभाव की थीं पर साथ में साफ दिल और स्पष्टवादी महिला भी थीं। इस प्रकार उनके साथ रहते हुए लोगों से अच्छी खासी पहचान बनना स्वाभाविक है।               तत्पश्चात मुझे किसी कारणवश उस कॉलेज से अपनी पढ़ाई और उनका साथ छोड़ना पड़ा किन्तु मैंने संगीत सीखना जारी रखा। उन दिनों मेरी क्लास सुबह हुआ करती ...

विश्व पर्यावरण दिवस, 5 जून पर विशेष।

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                              प्रकृति और नारी। 'प्रकृति   और नारी' बड़ी निराली है, तेरी ज़िदंगानी; चंद लफ्ज़ो में बयां नहीं कर सकती, मैं तेरी कहानी।।               प्रकृति और नारी के गुणों को चंद शब्दों में व्यक्त नही किया जा सकता। दोनों ही स्वयं में अथाह सागर की भांति हैं। क्योंकि दोनों का ही श्रेत्र सीमा अति व्यापक है, जिस प्रकार प्रकृति सम्पूर्ण धरती को स्वयं में समेटे हुए, उसे सहेजती है ठीक उसी प्रकार से एक नारी भी अपने सम्पूर्ण परिवार को समर्पित उसका पालन-पोषण करती है।        यदि प्रकृति और नारी की तुलना की जाए तो दोनों ही समान हैं, जिस प्रकार नारी "चंचलता और गम्भीरता" दोनों ही गुणों को आत्मसात करते हुए समय-समय पर अनेक रूप धारण करती है, 'उसे अनेक रिश्तों की संज्ञा दी जाती है।' उसी प्रकार प्रकृति में भी "चंचलता और गम्भीरता" जैसे गुण पाए जाते हैं। जैसे- तेज़ चलती हुई हवा चंचलता का परिचायक है, और रूका हुआ शांत जल अपनी गम्भीरता का परिचय...

मातृ दिवस पर विशेष चर्चा।

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" मांं"  वह शब्द है जिसमें अर्थ ही अर्थ है; जिसकी तुलना किसी और से करना व्यर्थ है। इस रिश्ते का कोई मोल नही है; यह रिश्ता सबसे अनमोल है। यदि हम मां के बारे में चर्चा करें तो शायद शब्द कम पड़ जाएंगे।  यदि हम ज़िक्र करें इक मां और बच्चे के रिश्ते के बारे में तो शायद ही उसे शब्दों में पिरोया जा सकता है। क्योंकि मां शब्द अपने आप में बहुत ही विस्तृत है। यदि हम बात करें "क्या होती है इक मां की भूमिका हमारे जीवन में ?" तो शायद ही उसके स्वरूप को भली-भांति व्यक्त किया जा सकता है। मां ही हमारी जननी है, मां हमारा पालन-पोषण करती है, मां ही हमारे खुशियों का ख़्याल रखती है, और हर वक्त व हर पल मां ही हमारे साथ खड़ी होती है। इसीलिए मां का होना बेहद ज़रूरी है, इसलिए मां का सम्मान करें और अपने ख़्याल से पहले रखें मां का ख़्याल, क्योंकि बिना मां के नहीं बनती किसी की ज़िंदगी मिसाल। मां का रिश्ता होता ही बहुत खास है, बहुत ही प्यारा-निराला और सर्वोपरि सबसे ऊपर होता है मां का रिश्ता। मां का रिश्ता भगवान् से भी ऊपर होता है, क्योंकि हर वक्त, हर पल, हर जगह भगवान् नही पहुं...

पृथ्वी की पुकार।

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 पृथ्वी दिवस 22 अप्रैल पर विशेष... मैं जननी हूं तो विनाशनी भी, मै दाता हूं तो हरणी भी। मेरा सदुपयोग करोगे तो फलोगे-फूलोगे, बन विलासी यदि दुरुपयोग करोगे तो मिट्टी में मिल जाओगे। मैं तेरी "मां" तो नहीं, पर "मां" जैसी हूं। फर्क बस इतना है- उसने तुझे जन्म दिया है, और मैंने तुझे पाला है। रख मेरी सरज़मी पर कदम, तूने चलना सीखा है, आज होकर बड़ा तूने पूरे जहां को रौंद डाला है। मां जैसी हूं तेरी, क्षमा करना स्वाभाविक है। देता है समय तुझे इक और अवसर, तू अपनी गलती सुधार ले। कर धरती को पुनः हरा-भरा, इसमें तेरी भलाई है। बस यही तेरे आगे पड़ी सच्चाई है। सींच दो इस धरती को, पहना नया वसन, हो जाऊं मैं भी खुश, और हो तेरा भरन। अपने लिए ना सही,  आने वाली पीढ़ी को नई सौगात दे। अपने कोशिशों से कर उनकी ज़िंदगी आबाद दे। ये मेरा मशवरा नही; तेरे लिए, ये तो फ़रमान है। कर मेरी ख़्वाहिश पूरी, यही मेरी अरमान है।                            https://khushithoug...

जीवन रेखा कितनी छोटी?

जीवन रेखा कितनी छोटी? हाथ की लकीरों से भी बौनी। ज़र्द पड़ी जा रही दिन-ब-दिन  चेहरा भी मुरझा रहा है। किस नीम हकीम की दवा से  चेहरा खिले फिर गुलाबों के जैसे। धीरे-धीरे कुछ सिकन सी उभर रही थी उसके चेहरे पे। अब ख़ौफ भी मुझे सता रहा था  ग़र हार गई मैं इसकी बाज़ी । क्या होगा औरों का, जो चढ़ी नही  भेंट उन दरिंदों के । आखिर हुआ वही जिसका डर था  टूट गई सांसो की डोरी । जीवन रेखा कितनी छोटी? हाथ की लकीरों से भी बौनी ।     khushithought.blogspot.in

बिदाई बंसत की....

बंसत ॠतु है घर जाने वाली  अब गर्मी है आने वाली। खोल के रख लो खिड़की-दरवाजे भर के रख लो हवा को सारे। मौसम का कोई ईमान नही जैसा भी हो, थोड़ा सा बेईमान सही। बदलेगा तो हम भी बदल जाएंगे  हम भी इसके साथ कदम मिलाएंगे। कमर कस लो सारे वासी हारना नही है मौसम की बाज़ी। बिमारी ना दस्तक दे इसलिए करना है ज़रा सफाई। जन-जन को है जागरूक करना बंसत ॠतु है घर जाने वाली। अब गर्मी है आने वाली  इसलिए कर लो अभी से तैयारी । khushithought.blogspot.in

सबक.....✏

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इक पंछी उड़ा अज़नबी शहर की ओर : ले ताना-बाना बुनने को,अपने सपनो की डोर।  ट्रेन अपने निर्धारित स्टेशन पे रुकी और सीटी बजते ही मैं नींद से जागा आँख मलते हुए बाहर देखा तो मेरा स्टेशन आ चुका था। मैं उतरने के लिए अपना सामान समेटने लगा और ट्रेन से उतरकर कैंटीन की तरफ़ बढ़ा, गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी इस कारण आने जाने वालों की भीड़ भी जबर्दस्त थी। गर्मी और भीड़ देखकर मैं ऊफ करना चाहा। पर करता भी क्या मैं, ये पेट जो भूख का मारा था। मन ही मन सोचने लगा जो सुकून अपने घर और गांव में है वो कहीं और नही है।  मैं काउन्टर पर पहुंच कर मेन्यू कार्ड देखते हुये छोला-चावल का आर्डर देकर फिर से अपने बेंच पर आकर बैठ जाता हूं। और अपने सपनों में खो जाता हूं, मैं  नये शहर में आकर काफ़ी रोमांचित था पर कहीं-न-कहीं मेरे मन में इक भय भी था कि इस नये शहर में स्वयं को स्थापित कर पाऊंगा भी या नही। फिर भी मैं स्वयं का बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूं इसलिए स्वयं को तसल्ली देते हुए मन ही मन दृढ़ निश्चय करने लगा और घर की स्थिती को बदलने के बारे में सोचने लगा। पर वक्त के बारे में कौन जानता है। तभी सामने से ...