सुरक्षा; गांव बनाम शहर

 











आज सुबह जब मैं स्टेशन के लिए जा रही थी तक़रीबन चार बज रहे होंगे। अंधेरा वैसा ही जैसा रात का, सूर्योदय होने में अभी समय था। वो अलग बात है कि आज हर गांव में बिजली की पहुंच है जिसकी लिए सरकार धन्यवाद की पात्र है। 

     लेकिन इन सभी के बीच जो मैंने देखा, वह है सुरक्षा के कोई चाक-चौबंद की व्यवस्था न होने पर भी आज भी लोग गर्मी का मौसम होने के कारण घरों के बाहर चारपाई डालकर सो रहे थे। भोर का समय था तो महिलाएं भी शौच आदि के लिए बाहर जा रही थी जो कि हर गांव की परंपरा है कि घर में शौचालय होते भी लोग शौच के लिए बाहर जाना अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते हैं। कुछ लोग घर के बाहर खड़े जम्हाई ले रहे थे, सम्भवतः तुरंत जगे होंगे। यह सब देखते हुए मेरे मन में एक विचार कौंध गया। सुरक्षा की तो बात ही छोड़ दीजिए जिस तरह लोग बेधड़क घरों के बाहर सो रहे हैं, महिलाऐं अंधेरे में भी विचरण कर रही हैं, सन्नाटा होते हुए भी हर दस क़दम पर लोग मिल जाएंगे।

      न ही लोगों को चोर उचक्कों का डर न ही किसी जंगली जानवर का। लोगों में ऐसी निश्चिंतता देखकर मैं अचरच से भर उठी। पर मुद्दा यहीं ख़त्म नहीं होता, सवाल यह है कि क्या शहरों में भी ऐसी निश्चिंतता सम्भव है। जहां सुरक्षा के सैकड़ों इंतजाम हैं। वहां न तो कोई सन्नाटा न ही कोई अंधेरा। लाईटों की जगमगाहट कभी रात होने ही नहीं देती। पुलिस हमेशा अपने तीसरे नेत्र से सभी गतिविधियों पर नज़र रखती है। सीसीटीवी कैमरे भी 360° एंगल्स से लोगों को घूर रहा होता है। 

     पर विडंबना यह है कि शहरों में अपराध कम नहीं हो रहा। सब कुछ लोग सरकार, प्रशासन पर नहीं छोड़ा जा सकता। देश का नागरिक होने के नाते सभी का कर्तव्य होता है कि हर ग़लत काम का विरोध करे, ताकि कोई जान अनहोनी से बच जाए। पर नहीं, ग़लत होते हुए भी लोग देखकर मूक और बधिर हो जाते हैं। मन में यह विचार करके कौनसा यह मेरे या मेरे अपनों के साथ हो रहा है। 

     काश गांवों जैसी विचारधारा शहरों में भी विद्यमान होती जिसे शहर में फैंसी शब्द के तौर पर माइंड सेट बोलते हैं। हर कोई एक-दूसरे से अनजान होने के बजाय परिचित होता। 

     ख़ैर 'मुर्दों के शहर' से क्या ही उम्मीदें रखना। 



                            - के• के• लीलानाथ

    

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