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【सो जाओ मोहन रैन आई...】

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सो जाओ मोहन रैन आई विश्राम करो नैन अलसाई। आंखें मूंदत भोर मा जागत उठत क्रीड़ा संध्या धावत। रात्रि आई फिर घर आवत भोजन कर माखन खावत। सो जाओ मोहन रैन आई विश्राम करो नैन अलसाई।। प्रातः उठ वही दोहरावत उठत खावत पुनः धावत वही लाड प्यार है पावत माता को भी यह भावत सो जाओ मोहन रैन आई विश्राम करो नैन अलसाई।।

◆ Depression (अवसाद), शिकार या सुधार। किस स्थिति में हैं आप? ◆

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(विश्व स्वास्थ्य दिवस ७ अप्रैल) "डिप्रेशन (अवसाद) एक प्रकार की मानसिक बिमारी व आशांति है।"   अवसाद का सम्बन्ध मस्तिष्क के उन हिस्सों से है, जहां से निद्रा, जागरण व चेतना की स्थिति नियंत्रित होती है।       क्या है कारण?   सामाजिक व पारिवारिक कारण:-  आज के दौर में डिप्रेशन (अवसाद) का शिकार होना बहुत सामान्य सी बात बन गई है। एक सामान्य व्यक्ति भी कब डिप्रेशन का शिकार हो जाता है पता ही नहीं चलता। आज व्यक्ति मानसिक दृष्टि से इतना कमजोर हो चुका है कि उसके जीवन में ज़रा सा उतार-चढाव क्या आता है, कि उस विषय में इतना सोचता है कि खुद को अवसाद ग्रस्त बना लेता है और यही अवसाद उसे अत्महत्या की ओर ले जाता है। वर्तमान में युवा वर्ग विशेष कर स्टूडेंट्स में यह अधिक देखने को मिलता है। बड़े होने के साथ-साथ पढ़ाई का दबाव और जिम्मेदारियों का बढ़ना उन्हें असहज और अप्रिय माहौल लगने लगता और जब वे उसमें जल्दी सामांंज्स्य नहीं बिठा पाते तब लगातार उस बारे में सोचने लगते हैं और यह उन्हें बड़ा ही असम्भव सा लगता जिसको लेकर वे बहुत चिंतित हो जाते हैं। जो आगे चलकर उनकी ...

कोरोना- एक प्राकृतिक आपदा के रूप में....

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(कोरोना) कोरोना एक महामारी है कुदरत की चिंगारी है। है रुष्ट अब धरा भी प्रकृति का ह्रास हुआ। है जनजीवन संकट में सत्य का नाश हुआ। जल, थल, नभचर का  घर मानव ने उजाड़ा है। उनका भी हक़ है धरती पर आख़िर उन्होंने क्या बिगाड़ा है? पृथ्वी की गोद में सबको समान अधिकार है। जो ना समझे इस मर्म को उसको धिक्कार है। प्रकृति का दोहन छोड़ के प्रति मानव पेड़ लगाओ। विकास गति थोड़ी धीमी कर इस संसार को स्वर्ग बनाओ। - ©ख़ुशी कान्दू

नाटक-: एक सवप्न प्लास्टिक मुक्त भारत का......

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पात्र परिचय 1- रामाधीन मुंशी 2- मुंशी की पत्नी 3- वकील 4- वकील की पत्नी 5- चेतू (सब्ज़ी वाला) 6- एक अन्य ग्राहक (प्रथम दृश्य / रामाधीन मुंशी जी के घर का दृश्य) (रामाधीन मुंशी जी प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर भगवान की आराधना में व्यस्त अपने इष्ट का गुणगान करते हुए...) हरे कृष्णा हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा  हरे हरे। हरे रामा हरे रामा, रामा रामा हरे हरे।। भजन समाप्त करते हुए प्रभु की चरनो में नतमस्तक होते हैं। पूजा-पाठ खत्म करने के बाद बाहर बरामदे में लगी कुर्सी पर आकर बैठ जाते हैं और वहां रखी अख़बार उठाकर पढ़ने लगते हैं। थोड़ी देर बाद उनके पड़ोसी मित्र जो पेशे से वकील हैं, टहलते हुए आते हैंं।  मुंशी जी-   आइए-आइए बैठिए, आज इधर कैसे आना हुआ? वकील - (बैठते हुए बोलते हैं) हां! काफी दिनों से आप दिखाई नहीं दिए और इधर से टहलते हुए जा रहा था तो सोचा आप से भी मिलता चलूं। मुंशी जी - हां आजकल जोड़ों का दर्द कुछ अधिक ही बढ़ गया है, सो नहीं जा पाता हूं सुबह टहलने... वकील - हां आपकी बात भी सही है, अब क्या किया जाए जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती है, वैसे वैसे तमाम बिमारियां...

【मंदिर-मस्जिद में फ़र्क दिखाए मुझे】

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बंटवारे से हम भी थोड़े प्रेरित हुए,  इसलिए हमारे शब्द भी इसी पर केन्द्रित हुए। कोई ज्ञानी हो तो बताए मुझे  मंदिर व मस्जिद में फ़र्क दिखाए मुझे। मैंने तो सुना था ईश्वर एक है किन्तु यहां आकर मैंने जाना! भगवान अनेक है।। उसका रंग अलग  एक ने चुना लाल रंग तो दूजे हरे रंग से शान बढ़ाते हैं। उसका रूप अलग एक के माथे पर मोर मुकुट तो दूजे को टोपी पहनाते हैं उसकी बनावट अलग  एक को निराकार तो दूजे को सकार ब्रह्म दिखाते हैं।। उसकी सजावट अलग एक को आभूषणों से तो दूजे को केवल चादर चढ़ाते हैं उसकी भाषा अलग एक को उर्दू तो दूजे को संस्कृत से दर्शाते हैं। उसकी परिभाषा अलग। हाय! परिभाषा में ना जाने लोग क्या-क्या बतलाते हैं।। बस इन्हीं आधारों पर कर दिया पृथक ईश्वर-अल्लाह को अब हर रोज़ मज़हब के नाम पर लड़वाते हैं। व्यथित हो रहा ये मन मेरा  आख़िर कब अंत होगा इस व्याग्रता का जिसको हम व्यर्थ में सहते जाते हैं।। काश! समझ पाता यह मानव प्रेम से बढ़कर कुछ नहीं क्यूं बेवजह हम एक-दूजे का रक्त बहाते हैं। ना कोई स्थाई सदस्य है इस दुनिया का ...

【कर्म ही पूजा है】

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कर्म ही पूजा है.... कर्म करो फल की चिंता दो छोड़,  मानव हो तो इस बंधन को दो तोड़। (प्रस्तुत कविता में एक तितली के माध्यम से मनुष्यों को निर्बाध कर्म करते रहने का संदेश दिया गया है।) दिन-प्रतिदिन फूलों से रस लाऊं अपना भोजन स्वयं पकाऊं। यहां कर्म-फल की विधा है सोई जिसका मर्म ना जाने हर कोई। पशु-पक्षी ना जाने यह सार फिर भी कर्म करे हजार। थकते हैं हम बेज़ुबान भी पर करते नहीं बयान कभी। भूख-प्यास हमें भी सताए पर इसका हाल कभी ना बताए। फिर भी मानव की क्या कथा सुनाए वो तो स्वयं के जीवन से ही पछताए। मानव ना जाने कहाँ व्यस्त है अपने जीवन से क्यों त्रस्त है। कर्म के महत्व को भलीभांति जानता है फिर भी ना जाने क्यूं कर्म से भागता है। हे प्रकृति! अब तुम ही बताओ भटके हुए मानव को राह दिखाओ। कैसे मानव की प्रेरणा स्रोत बनें उनके अंधियारे का ज्योत बनें। हमारे पास ना बोली और ना ही भाषा है हमारी तो बस मूक दर्शक की परिभाषा है।                                   ...

【छपाक से....】

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छपाक से। (Chhapaak Se) A Poetry Dedicated To All Acid Victim. जल जैसी कुछ बूंदे जब गिरी मेरे  मुखमण्डल पर छपाक से। तब बड़ा ही सुखद एहसास हुआ किन्तु तुरंत मुझे कुछ आभास हुआ। अरे! यह तो शीतल जल नहीं यह कुछ ज्वलनशील सा है। ये क्या है? जिसका मुझे पता नही जिसका अनुभव भी बिल्कुल नया है। जल रही हो त्वचा जैसे; क्या सचमुच ऐसा है? जिसका भलीभांति मुझे पता नहीं। यदि ऐसा ही है, और यही सच है जो 'एक अनहोनी' और अमिट है। लेकिन मुझे कहां पता था कि  दुनिया में ऐसी भी कोई चीज़ है। जो खुद्दारों के लिए बड़ा ही अज़ीज़ है। जिनके प्रतिशोध का यह हथियार है जो हमारे जीवन में जबरदस्ती हिस्सेदार हैं। जिनके ज़हन में इनकार शब्द ही नहीं वो तो मात्र मनमानी के तलबगार हैं। जिन्हें आता नहीं जीने का सलीक़ा  समझते हैं खुद को दुनिया का ख़लीफ़ा। जो मात्र बीभत्स में आकर करते ये काम हैं मानो इनका जिना भी यहां हराम है। जिनके पास मन, मस्तिष्क, चेतना, सब विद्ममान हैंं। फिर भी निर्दयता से पूर्ण, बने ये अज्ञान हैं।                   ...