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माही सुन....

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बात हमारी सुन, वो माहिया मेरे दिल की धुन। क्या कह रहा है ये दिल,  ज़रा हौले-हौले सुन। बादल के जैसा है ये गुस्सा मेरा,  इक पल ठहर, दूजे पल निकल जाना है। सागर के जैसा है ये दिल मेरा, ना होगा खाली, सिर्फ़ बढ़ते चले जाना है। झरने जैसा बहना चाहती हूं, तेरे रग-रग में। बन पंछी उड़ जाना चाहती हूं, तेरे ही संग में। सिमटना है तुझमें,जैसी कुदरत संग सिमटी है धरती। पाना है तुझको, जैसी नई रूह संग जुड़ी हो अभी ज़िदंगी। जीने के लिए कम नहीं हैं, ये सारे अंदाज़, मिलकर जिएंगे, इस नयी ज़िदंगी का एहसास।

【नाट्य विवरण】

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 नाटक:- "सीता परित्यागः" उ.प्र. संस्कृत संस्थानम् एवम् (आईकैड) इन्स्टीट्यूट ऑफ कल्चरल एण्ड एस्थेटिक डाइमेंशन्स के संयुक्त तत्वाधान में एक मासात्मक संस्कृत नाट्य प्रशिक्षण कार्यशाला की प्रस्तुति "सीता परित्यागः"  का सफल मंचन दिनांक 8 नवंबर, 2019 को "बी. एम. शाह प्रेक्षागृह, बीएनए परिसर" में हुआ। आलेख:- डॉ नवलता परिकल्पना एवं निर्देशन:- चित्रा मोहन कार्यशाला/संस्कृत प्रशिक्षण:- संध्या रस्तोगी। _______________________________________ नाटक:- "अंधेर नगरी"   भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी की कालजयी नाटक अंधेर नगरी का सफल मंचन सांस्कृतिक विभाग के सहयोग से  30 सितम्बर, सोमवार को राय उमानाथ बली सभागार में किया गया। नाटक के निर्देशक के रूप में माननीय योगेंद्र कुमार जोशी व माननीय विपिन कुमार जी की सहभागिता रही।  _____________________________________  नाटक:- "बिस्तर में इतिहास"   का मंचन 01/01/2019 को रायउमानाथ बली प्रेक्षागृह में हुआ। इस नाटक का लेखन युवा रंगकर्मी 'नागपाल' एवं निर्देशन युवा रंगकर्मी ...

फिर आना होगा तुमको!

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वृषभानु दुलारी देख रही पथ को रही निहार  पथिक आवत जात देख मन में उठत विचार। बीते पहर नैन अलसाई  मोहन संग क्यूं प्रीत लगाई।। ।।। आस   जगी फिर आस मिटी   उर चिंतित हुए बिन सुजान को  बावरी सी घूम रही जोगन बन पंछी डाली-डाली।। ।।। पात-पात पर लिख रही यही आज नहीं तो कल  कल नहीं तो कलियुग में  फिर आना होगा तुमको।। ।।। हे! जग के पालन हार करने इस जग का उध्दार फिर से करने दुष्टों का संहार फिर से पाने राधा का प्यार ।।। कर रहा प्रतिक्षा यह संसार फिर आना होगा तुमको हे! जग के पालन हार हे! जग के पालन हार।।                                                                -©®K.K.Leelanath✍ https://khushithought.blogspot.com

बालिका दिवस।

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बेटियाँ! हैं इस संसार में बहुमूल्य खजाना सहेजना, सम्मान देना, प्यार देना। तुम इन्हें कभी ना गंवाना! फ़ुर्सत के दो पल निकालना और  ज़रा सोचना,  क्या किया है उसने कभी शिकवा या  कोई बहाना। निरन्तर से चली आ रही विधान को  है उसने माना, कभी धर्म, कभी संस्कृति मान कर है उसे निभाया।             https/khushithoughtblogspot.com

हिंदी दिवस 14 सितंबर

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शॉर्टकट!

आजकल तो शॉर्टकट बोलने का ज़माना है  मुँह में जो आ जाए बन जाता वही फ़साना है।                                कभी पी.एम. रात्रि को सुबह ए.एम. मैत्री से मिलने जाना है।। कभी पी.एम. मंत्री को सी.एम. मंत्री साहिबा को आंख दिखाना है।। कभी बी.एफ. तो कभी जी.एफ.। कभी बी.एफ.एफ. तो कभी जी.एफ.एफ. को ढूंढते-ढूंढते गूगल पे ही थक जाना है।। हास्यप्रद दशा देखो मानव की। कभी एफ.एम. रेडियो तो कभी एम.एफ. को उल्टा करके मेल-फिमेल बनाना है।। https://khushiThought.blogspot.com Fb.me/Khushikanduthought 

【घर से दूर मैं मजबूर】

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         बात उन दिनों की है जब मैं लखनऊ में  शास्त्रीय संगीत की छात्रा थी। घर से दूर इक अज़नबी शहर में रहते हुए हर छोटे-बड़े  अनुभव को आत्मसात करने की कोशिश कर रही थी। ऐसे भीड़ -भाड़ वाले शहरो में हर रोज़ कुछ ना कुछ  घटनाएं अवश्य होती रहती हैं। इन सब घटनाओं को मद्देनजर रखते हुए, मैं खुद को उस परिवेश में ढालने की कोशिश कर रही थी। यह मेरा शुरूआती दौर तो नही था, "यथा- तथा लगभग दो वर्ष बीत चुके थे" फिर भी मैं यहां के अपरिचित लोगों से भयभीत रहती थी।  जैसा कि हर लड़की के साथ होता है। शुरुआत के दो वर्ष मैं अपने ही कॉलेज की शिक्षिका के साथ रही। जो की मेरी शिक्षिका कम गुरु माँ और बड़ी बहन ज्यादा थीं। हां वो थोड़ी क्रोधित स्वाभाव की थीं पर साथ में साफ दिल और स्पष्टवादी महिला भी थीं। इस प्रकार उनके साथ रहते हुए लोगों से अच्छी खासी पहचान बनना स्वाभाविक है।               तत्पश्चात मुझे किसी कारणवश उस कॉलेज से अपनी पढ़ाई और उनका साथ छोड़ना पड़ा किन्तु मैंने संगीत सीखना जारी रखा। उन दिनों मेरी क्लास सुबह हुआ करती ...