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【सो जाओ मोहन रैन आई...】

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सो जाओ मोहन रैन आई विश्राम करो नैन अलसाई। आंखें मूंदत भोर मा जागत उठत क्रीड़ा संध्या धावत। रात्रि आई फिर घर आवत भोजन कर माखन खावत। सो जाओ मोहन रैन आई विश्राम करो नैन अलसाई।। प्रातः उठ वही दोहरावत उठत खावत पुनः धावत वही लाड प्यार है पावत माता को भी यह भावत सो जाओ मोहन रैन आई विश्राम करो नैन अलसाई।।

कोरोना- एक प्राकृतिक आपदा के रूप में....

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(कोरोना) कोरोना एक महामारी है कुदरत की चिंगारी है। है रुष्ट अब धरा भी प्रकृति का ह्रास हुआ। है जनजीवन संकट में सत्य का नाश हुआ। जल, थल, नभचर का  घर मानव ने उजाड़ा है। उनका भी हक़ है धरती पर आख़िर उन्होंने क्या बिगाड़ा है? पृथ्वी की गोद में सबको समान अधिकार है। जो ना समझे इस मर्म को उसको धिक्कार है। प्रकृति का दोहन छोड़ के प्रति मानव पेड़ लगाओ। विकास गति थोड़ी धीमी कर इस संसार को स्वर्ग बनाओ। - ©ख़ुशी कान्दू

【बाला हूं इस देश की!】

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बाला हूं इस देश की,  कुछ फ़र्ज मेरे भी नाम हैं। सीमा पर जाकर लड़ नहीं सकती, इसलिए मेरी दुआ हमेशा वीरों के साथ है। ।। जिन्होंने घर-आंगन को  छोड़ा है, और मां की ममता से भी मुंह मोड़ा है। जिन्होंने सरहद पर जाकर,  अपना दम तोड़ा है। ।। करता है देश की रखवाली, अपनों का दामन छोड़ा है। ज़िंदगी भी उनकी क्या खूब ज़िंदगी है, खुद के ख़्वाबों को छोड़कर  गैरों के सपनों को ओढ़ा है। ।। सोते हैं हम चैन से अपने घरों में, ये वीरों की ही पहरेदारी है जिसने जगते-जगते,  पूरी रात गुज़ारी है। ।। ग़र आज मुल्क आज़ाद है, और हर तरफ खुशहाली है। ये लहलहाती फसल, और चारों तरफ हरियाली है। ।। ये शहीदों  के ही कुर्बानी का फल है जो शाश्वत और अटल है। जो देश की सेवा में हर क्षण तत्पर और निश्छल हैं। ।। यह विरासत हमने,  शहीदों की ही बदौलत पाया है। जिन्होंने अपने प्राणों को दांव पर  लगाकर,  ये इतिहास बनाया है। ।। शत-शत नमन ऐसे शूरवीरों को,  जो भारत मां के लाल हैं। जो इस देश के प्रहरी,  जिनका  हृदय हिमालय ...

◆शायरी संग्रह◆

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-------------------------------------------------- एक ना एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा, इक बार "फर्दा" फिर मुस्कुराएगा। मैं रहूं या ना रहूं, ये जहान; मुझे मेरी नज़्म में हर वक़्त पाएगा। (फर्दा:-आने वाला कल, नज़्म:-कविता) -------------------------------------------------------- अमावस की रात, फिर भी तारों की बारात है। वो जुगनू सी धूमिल, फिर भी मेरी हयात है। (हयात:- ज़िन्दगी) --------------------------------------------------- वो भी क्या "दहर" था, जब हर जगह तेरा ही कहर था। तेरे ही चर्चें हुआ करते थे हर गली में जब तुझपर फ़िदा पूरा शहर था। (दहर:- दौर, समय) --------------------------------------------------- मैं उकेरती शब्द बैठ कर तन्हाई में तुम हो की पढ़ते ही नहीं रात की गहराई में। ...... मैं ढूंढती तुम्हें इतनी शिद्दतों से तुम हो की मिले ही नहीं इतनी मुद्दतों से। ------------------------------------------------------- कौन कहता हैं कि....  हम इश्क़ में बर्बाद हो गए।  हम तो आशिक़ी मे बन" शायर"  इस जहां में आबाद हो गए...