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केश

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  हे मधुसूदन! पतित पावन यह निर्मल काया। गोविंद फिर ऐसा अनर्थ क्यूं; यह कैसी माया।। बिखरा दिए केश द्रौपदी ने दुःशासन अब तू बच ना पाएगा किया है स्पर्श अग्नि को तूने रणभूमि में इसका मूल्य चुकाएगा। मैं ज्वाला हूँ अग्नि की इसकी तेज तू सह ना पाएगा जलकर भस्म पतिंगा जैसे तू भी भस्म भस्म हो जाएगा। इन मलिन हाथों को धो डाल तू वरना काल का ग्रास बन जाएगा ना काम आएंगे शत बन्धु तेरे अकेले अपनी चिता सजाएगा। रक्त उतर आया इन नैनों में अब तू भी रक्त के अश्रु बहाएगा जब सामना होगा तेरा पाण्डवों से तू स्वयं तिल-तिल कर मर जाएगा। ना कोई होगा साथ तेरे जब अपने कुकर्मों का फल पाएगा तू हंसी का पात्र बनेगा तू अपयश का भागी बन जाएगा। जिस कुल में तूने जन्म लिया उसको भी तार तार कर जाएगा करके खण्डित मर्यादा अपनी पाप का भागी तू बन जाएगा। -©® Khushi Kandu 'Leelanath'

【बाला हूं इस देश की!】

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बाला हूं इस देश की,  कुछ फ़र्ज मेरे भी नाम हैं। सीमा पर जाकर लड़ नहीं सकती, इसलिए मेरी दुआ हमेशा वीरों के साथ है। ।। जिन्होंने घर-आंगन को  छोड़ा है, और मां की ममता से भी मुंह मोड़ा है। जिन्होंने सरहद पर जाकर,  अपना दम तोड़ा है। ।। करता है देश की रखवाली, अपनों का दामन छोड़ा है। ज़िंदगी भी उनकी क्या खूब ज़िंदगी है, खुद के ख़्वाबों को छोड़कर  गैरों के सपनों को ओढ़ा है। ।। सोते हैं हम चैन से अपने घरों में, ये वीरों की ही पहरेदारी है जिसने जगते-जगते,  पूरी रात गुज़ारी है। ।। ग़र आज मुल्क आज़ाद है, और हर तरफ खुशहाली है। ये लहलहाती फसल, और चारों तरफ हरियाली है। ।। ये शहीदों  के ही कुर्बानी का फल है जो शाश्वत और अटल है। जो देश की सेवा में हर क्षण तत्पर और निश्छल हैं। ।। यह विरासत हमने,  शहीदों की ही बदौलत पाया है। जिन्होंने अपने प्राणों को दांव पर  लगाकर,  ये इतिहास बनाया है। ।। शत-शत नमन ऐसे शूरवीरों को,  जो भारत मां के लाल हैं। जो इस देश के प्रहरी,  जिनका  हृदय हिमालय ...