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【कर्म ही पूजा है】

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कर्म ही पूजा है.... कर्म करो फल की चिंता दो छोड़,  मानव हो तो इस बंधन को दो तोड़। (प्रस्तुत कविता में एक तितली के माध्यम से मनुष्यों को निर्बाध कर्म करते रहने का संदेश दिया गया है।) दिन-प्रतिदिन फूलों से रस लाऊं अपना भोजन स्वयं पकाऊं। यहां कर्म-फल की विधा है सोई जिसका मर्म ना जाने हर कोई। पशु-पक्षी ना जाने यह सार फिर भी कर्म करे हजार। थकते हैं हम बेज़ुबान भी पर करते नहीं बयान कभी। भूख-प्यास हमें भी सताए पर इसका हाल कभी ना बताए। फिर भी मानव की क्या कथा सुनाए वो तो स्वयं के जीवन से ही पछताए। मानव ना जाने कहाँ व्यस्त है अपने जीवन से क्यों त्रस्त है। कर्म के महत्व को भलीभांति जानता है फिर भी ना जाने क्यूं कर्म से भागता है। हे प्रकृति! अब तुम ही बताओ भटके हुए मानव को राह दिखाओ। कैसे मानव की प्रेरणा स्रोत बनें उनके अंधियारे का ज्योत बनें। हमारे पास ना बोली और ना ही भाषा है हमारी तो बस मूक दर्शक की परिभाषा है।                                   ...

【On the spot!】

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दो शब्द....✍ यह कहानी नहीं कड़वा अनुभव है, मेरे जीवन का जिसे मैंने संवारा है।  यह कल्पना नहीं हकीकत है। जिसे मैंने शब्दों में पिरोकर पन्नों पर उतारा है।  यूं तो सभी के जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, जिसमें कई व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में सामंजस्य बना लेते हैं और आगे निकल जाते हैं, किंतु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जीवन में आने वाली चुनौतियों को विकट समस्या मानकर उसी में उलझे रहते हैं और जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाते।  वैसे मैं बात कर रही हूं मेरे साथ घटी एक घटना के बारे में जिससे मैं आहात तो नहीं कहूंगी, 'लेकिन परेशान ज़रूर हो गई थी।'  साथ ही बैचेन भी। कि आख़िर मैंने ग़लती की कहां? यही सवाल बार-बार मेरे मन को कूरेद रहा था।        दरअसल हम सभी रंगमंच के कलाकार अपनी भावी नाटक का पूर्वाभ्यास कर रहे थे, और हुआ ये कि पूर्वाभ्यास के दौरान पता चला कि हमारे कुछ साथी कलाकार नहीं आएंगे। तभी हमारे डायरेक्टर (सर) ने आदेश दिया कि, फला वयक्ति का डायलॉग मुझे पढ़ना है। मैंने स्क्रिप्ट उठाया और पढ़ना शुरू किया। ज्यों का त्यों मैंने उस डायलॉग को पूर...

【मैं ऐसी नारी नहीं !】

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छोड़ दिया उसने तो टूट जाऊँ मैं ऐसी नारी नहीं।। पुनःडूब जाऊँ उसकी स्मृतियों में  आती ऐसी कारीगरी नहीं।। दुष्ट के साथ दुष्टता करूं मुझे ऐसी दुष्टता प्यारी नहीं।। पौरूष का जो दम्भ भरे, बुद्धि नहीं क्रोध से। प्रेम नहीं मोह से।। योग नहीं भोग से  काम और लोभ से।। उसने अपनी बुध्दिमत्ता को नहीं अपनी तुच्छता को दिखाया है। मैं क्यूँ डरूँ मैंने क्या गंवाया है।।  मेरा बस इतना दोष है कि मैं एक नारी, अभागिन, अबला, बेचारी हूं। ऐसा कहती दुनिया सारी है! किन्तु! यह मात्र एक भ्रम है सत्य नहीं असत्य है नारी ही शिव की शक्ति है ब्रह्माण्ड की भक्ति है।। नारी ही दुर्गा है नारी ही काली है नारी ही घर की निष्ठा है संसार की प्रतिष्ठा है।। अगर नारी सृजनकारी है, तो नारी ही  संहारकारी है।। जो अधर्मी, जो अत्याचारी है। जिनपर उनके ही पापों का बोझ भारी है। उनके लिए रौद्र रुप धारण कर बनती रूद्राणी है बनती रूद्राणी है.... /__________________________________\ https://khushithought.blogspot.com

फिर आना होगा तुमको!

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वृषभानु दुलारी देख रही पथ को रही निहार  पथिक आवत जात देख मन में उठत विचार। बीते पहर नैन अलसाई  मोहन संग क्यूं प्रीत लगाई।। ।।। आस   जगी फिर आस मिटी   उर चिंतित हुए बिन सुजान को  बावरी सी घूम रही जोगन बन पंछी डाली-डाली।। ।।। पात-पात पर लिख रही यही आज नहीं तो कल  कल नहीं तो कलियुग में  फिर आना होगा तुमको।। ।।। हे! जग के पालन हार करने इस जग का उध्दार फिर से करने दुष्टों का संहार फिर से पाने राधा का प्यार ।।। कर रहा प्रतिक्षा यह संसार फिर आना होगा तुमको हे! जग के पालन हार हे! जग के पालन हार।।                                                                -©®K.K.Leelanath✍ https://khushithought.blogspot.com

मातृ दिवस पर विशेष चर्चा।

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" मांं"  वह शब्द है जिसमें अर्थ ही अर्थ है; जिसकी तुलना किसी और से करना व्यर्थ है। इस रिश्ते का कोई मोल नही है; यह रिश्ता सबसे अनमोल है। यदि हम मां के बारे में चर्चा करें तो शायद शब्द कम पड़ जाएंगे।  यदि हम ज़िक्र करें इक मां और बच्चे के रिश्ते के बारे में तो शायद ही उसे शब्दों में पिरोया जा सकता है। क्योंकि मां शब्द अपने आप में बहुत ही विस्तृत है। यदि हम बात करें "क्या होती है इक मां की भूमिका हमारे जीवन में ?" तो शायद ही उसके स्वरूप को भली-भांति व्यक्त किया जा सकता है। मां ही हमारी जननी है, मां हमारा पालन-पोषण करती है, मां ही हमारे खुशियों का ख़्याल रखती है, और हर वक्त व हर पल मां ही हमारे साथ खड़ी होती है। इसीलिए मां का होना बेहद ज़रूरी है, इसलिए मां का सम्मान करें और अपने ख़्याल से पहले रखें मां का ख़्याल, क्योंकि बिना मां के नहीं बनती किसी की ज़िंदगी मिसाल। मां का रिश्ता होता ही बहुत खास है, बहुत ही प्यारा-निराला और सर्वोपरि सबसे ऊपर होता है मां का रिश्ता। मां का रिश्ता भगवान् से भी ऊपर होता है, क्योंकि हर वक्त, हर पल, हर जगह भगवान् नही पहुं...

सबक.....✏

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इक पंछी उड़ा अज़नबी शहर की ओर : ले ताना-बाना बुनने को,अपने सपनो की डोर।  ट्रेन अपने निर्धारित स्टेशन पे रुकी और सीटी बजते ही मैं नींद से जागा आँख मलते हुए बाहर देखा तो मेरा स्टेशन आ चुका था। मैं उतरने के लिए अपना सामान समेटने लगा और ट्रेन से उतरकर कैंटीन की तरफ़ बढ़ा, गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी इस कारण आने जाने वालों की भीड़ भी जबर्दस्त थी। गर्मी और भीड़ देखकर मैं ऊफ करना चाहा। पर करता भी क्या मैं, ये पेट जो भूख का मारा था। मन ही मन सोचने लगा जो सुकून अपने घर और गांव में है वो कहीं और नही है।  मैं काउन्टर पर पहुंच कर मेन्यू कार्ड देखते हुये छोला-चावल का आर्डर देकर फिर से अपने बेंच पर आकर बैठ जाता हूं। और अपने सपनों में खो जाता हूं, मैं  नये शहर में आकर काफ़ी रोमांचित था पर कहीं-न-कहीं मेरे मन में इक भय भी था कि इस नये शहर में स्वयं को स्थापित कर पाऊंगा भी या नही। फिर भी मैं स्वयं का बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूं इसलिए स्वयं को तसल्ली देते हुए मन ही मन दृढ़ निश्चय करने लगा और घर की स्थिती को बदलने के बारे में सोचने लगा। पर वक्त के बारे में कौन जानता है। तभी सामने से ...