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◆शायरी संग्रह◆

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-------------------------------------------------- एक ना एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा, इक बार "फर्दा" फिर मुस्कुराएगा। मैं रहूं या ना रहूं, ये जहान; मुझे मेरी नज़्म में हर वक़्त पाएगा। (फर्दा:-आने वाला कल, नज़्म:-कविता) -------------------------------------------------------- अमावस की रात, फिर भी तारों की बारात है। वो जुगनू सी धूमिल, फिर भी मेरी हयात है। (हयात:- ज़िन्दगी) --------------------------------------------------- वो भी क्या "दहर" था, जब हर जगह तेरा ही कहर था। तेरे ही चर्चें हुआ करते थे हर गली में जब तुझपर फ़िदा पूरा शहर था। (दहर:- दौर, समय) --------------------------------------------------- मैं उकेरती शब्द बैठ कर तन्हाई में तुम हो की पढ़ते ही नहीं रात की गहराई में। ...... मैं ढूंढती तुम्हें इतनी शिद्दतों से तुम हो की मिले ही नहीं इतनी मुद्दतों से। ------------------------------------------------------- कौन कहता हैं कि....  हम इश्क़ में बर्बाद हो गए।  हम तो आशिक़ी मे बन" शायर"  इस जहां में आबाद हो गए...

जहाँन को आजमाया है, तब जाना है।

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जहाँँन को आजमाया है, तब जाना है। लोगों को परखा है तब पहचाना है। माता-पिता जैसा कोई अपना नहीं उनसे दूर होना, इससे बुरा कोई सपना नहीं। नि:स्वार्थ जो प्रेम करे, वह मां-बाप है स्वार्थ के लिए जो साथ दे वह पालतू सांप है। दुनिया में अब हर कोई, दिमाग़ चलाता है इंसान तो क्या अब जानवर भी भाव खाता है। लोगों की सोच तो क्या, फ़ितरत भी बदल गई मतलब खत्म हुआ तो चाहत भी चली गई। आजकल अपनों को तो दूर, भगवान को भी नहीं पूछते विपत्ति ना पड़े तो, उन्हें भी नहीं पूजते। https://khushithought.blogspot.com

[जल से है जीवन]

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   जल से है जीवन जल से है यापन जल ही है सबसे बड़ा साधन।।। यूं ही ना समझो  तुम जल को क्षुद्र जल की महिमा ना जाओ भूल।। है नस-नस में दौड़ती तभी दौड़ रहे हम सभी।। सम्भव ही नहीं बिन जल के  इस सृष्टि का निर्माण।। सम्भव ही नहीं बिन जल के  मानव का उध्दार।। सम्भव ही नहीं बिन जल के  जीवों में प्राण।। जल का मूल्य समझो मूल्यवान बनोगे।। आने वाली पीढ़ी के लिए वरदान बनोगे।। https://khushithought.blogspot.com

【मैं ऐसी नारी नहीं !】

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छोड़ दिया उसने तो टूट जाऊँ मैं ऐसी नारी नहीं।। पुनःडूब जाऊँ उसकी स्मृतियों में  आती ऐसी कारीगरी नहीं।। दुष्ट के साथ दुष्टता करूं मुझे ऐसी दुष्टता प्यारी नहीं।। पौरूष का जो दम्भ भरे, बुद्धि नहीं क्रोध से। प्रेम नहीं मोह से।। योग नहीं भोग से  काम और लोभ से।। उसने अपनी बुध्दिमत्ता को नहीं अपनी तुच्छता को दिखाया है। मैं क्यूँ डरूँ मैंने क्या गंवाया है।।  मेरा बस इतना दोष है कि मैं एक नारी, अभागिन, अबला, बेचारी हूं। ऐसा कहती दुनिया सारी है! किन्तु! यह मात्र एक भ्रम है सत्य नहीं असत्य है नारी ही शिव की शक्ति है ब्रह्माण्ड की भक्ति है।। नारी ही दुर्गा है नारी ही काली है नारी ही घर की निष्ठा है संसार की प्रतिष्ठा है।। अगर नारी सृजनकारी है, तो नारी ही  संहारकारी है।। जो अधर्मी, जो अत्याचारी है। जिनपर उनके ही पापों का बोझ भारी है। उनके लिए रौद्र रुप धारण कर बनती रूद्राणी है बनती रूद्राणी है.... /__________________________________\ https://khushithought.blogspot.com