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विदाई अभी शेष है...

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  विदाई अभी शेष है... मेघ खाड़ी से सीधा उड़कर यही अड़ गया  मानो पूरब छोड़ उत्तर को बस गया।  कई दिनों से ठिठक कर रुका हुआ था मेरे गांव, खेत, खलिहान, और मुंडेरों पर। जैसे कोई बच्चा मेले में ठिठक जाता है मिठाई, खिलौनों, गुब्बारों की दुकान पर। ललचाई आंखों से निर्निमेष देखता लार से भीगे जिह्वा को संयत करता। वैसे ही आसमान से झांकते मेघ बेचारे  खुला हरा भरा मैदान देख;  अपने साथियों संग क्रीड़ा को आतुर। लालच वश कहीं भी न देखना  अथाह भरा पूरा हिमालय तो भूल ही गया। महीने का एक पक्ष पूरा बरसता रहा  रूक-रूककर, थम-थमकर। इस बार मेघ ने सभी को तृप्त किया समय से पूर्व, रिक्त से अधिक। मेघों को आता देख मंडूक भी  अपने समुदाय संग गायन को सज्ज हैं। शिखी भी अपने सतरंगी पंख फैलाए, इतराए। वैसे ही किसान भी रोहिणी नक्षत्र देख  धान हेतु खेतों को नहलाते-सहलाते  दुरुस्त करते  अपने हल, बैल, बीजों को। इस बरसात के मध्य कहीं दोपहरी में  एक-आध घंटे के लिए दिवाकर के दर्शन होते। जो कि पर्याप्त होता सूखने सूखाने हेतु  इस बरसात से ऊब तो नहीं हुई  पर मन भरा...

【सो जाओ मोहन रैन आई...】

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सो जाओ मोहन रैन आई विश्राम करो नैन अलसाई। आंखें मूंदत भोर मा जागत उठत क्रीड़ा संध्या धावत। रात्रि आई फिर घर आवत भोजन कर माखन खावत। सो जाओ मोहन रैन आई विश्राम करो नैन अलसाई।। प्रातः उठ वही दोहरावत उठत खावत पुनः धावत वही लाड प्यार है पावत माता को भी यह भावत सो जाओ मोहन रैन आई विश्राम करो नैन अलसाई।।

【कर्म ही पूजा है】

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कर्म ही पूजा है.... कर्म करो फल की चिंता दो छोड़,  मानव हो तो इस बंधन को दो तोड़। (प्रस्तुत कविता में एक तितली के माध्यम से मनुष्यों को निर्बाध कर्म करते रहने का संदेश दिया गया है।) दिन-प्रतिदिन फूलों से रस लाऊं अपना भोजन स्वयं पकाऊं। यहां कर्म-फल की विधा है सोई जिसका मर्म ना जाने हर कोई। पशु-पक्षी ना जाने यह सार फिर भी कर्म करे हजार। थकते हैं हम बेज़ुबान भी पर करते नहीं बयान कभी। भूख-प्यास हमें भी सताए पर इसका हाल कभी ना बताए। फिर भी मानव की क्या कथा सुनाए वो तो स्वयं के जीवन से ही पछताए। मानव ना जाने कहाँ व्यस्त है अपने जीवन से क्यों त्रस्त है। कर्म के महत्व को भलीभांति जानता है फिर भी ना जाने क्यूं कर्म से भागता है। हे प्रकृति! अब तुम ही बताओ भटके हुए मानव को राह दिखाओ। कैसे मानव की प्रेरणा स्रोत बनें उनके अंधियारे का ज्योत बनें। हमारे पास ना बोली और ना ही भाषा है हमारी तो बस मूक दर्शक की परिभाषा है।                                   ...

माही सुन....

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बात हमारी सुन, वो माहिया मेरे दिल की धुन। क्या कह रहा है ये दिल,  ज़रा हौले-हौले सुन। बादल के जैसा है ये गुस्सा मेरा,  इक पल ठहर, दूजे पल निकल जाना है। सागर के जैसा है ये दिल मेरा, ना होगा खाली, सिर्फ़ बढ़ते चले जाना है। झरने जैसा बहना चाहती हूं, तेरे रग-रग में। बन पंछी उड़ जाना चाहती हूं, तेरे ही संग में। सिमटना है तुझमें,जैसी कुदरत संग सिमटी है धरती। पाना है तुझको, जैसी नई रूह संग जुड़ी हो अभी ज़िदंगी। जीने के लिए कम नहीं हैं, ये सारे अंदाज़, मिलकर जिएंगे, इस नयी ज़िदंगी का एहसास।